Swadeshi movement

स्वदेशी आंदोलन

Swadeshi movement

1905–1947 Indian movement for domestic cloth production

स्वदेशी आंदोलन: भारत की आत्मनिर्भरता का बिगुल

स्वदेशी आंदोलन भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण अंग था जो भारतीय राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। इस आंदोलन की जड़ें 1903 में ब्रिटिश सरकार द्वारा बंगाल के विभाजन के फैसले में मिलती हैं।

बंगाल का विभाजन:

दिसंबर 1903 में ब्रिटिश सरकार ने बंगाल के विभाजन की घोषणा की। सरकार का आधिकारिक तर्क था कि 78 मिलियन आबादी वाला बंगाल प्रशासन के लिए बहुत बड़ा था। हालांकि, असली वजह यह थी कि बंगाल विद्रोह का केंद्र था और ब्रिटिश अधिकारी विरोधों को नियंत्रित नहीं कर पा रहे थे, जिन्हें वे पूरे भारत में फैलने का डर रहे थे।

1899-1905 तक भारत के वायसराय रहे जॉर्ज कर्जन ने 1904 में बंगाल के विभाजन की योजना बनाई। लेखक डेनिस जुड ने अपनी पुस्तक "लियोन एंड द टाइगर: द राइज एंड फॉल ऑफ द ब्रिटिश राज, 1600-1947" में लिखा है कि कर्जन भारत को स्थायी रूप से ब्रिटिश राज से जोड़ने की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन बंगाल के विभाजन और उसके बाद के विवादों ने कांग्रेस को और मजबूत बनाया। कर्जन ने 1900 में कांग्रेस को "अपने पतन की ओर झुकता हुआ" कहा था, लेकिन उन्होंने भारत को कांग्रेस के इतिहास में सबसे सक्रिय और प्रभावी होने के समय ही छोड़ दिया।

स्वदेशी आंदोलन का उदय:

बंगाल को धर्म के आधार पर विभाजित किया गया था: पश्चिमी भाग मुख्य रूप से हिंदू और पूर्वी भाग मुख्य रूप से मुस्लिम होगा। यह "बांटो और राज करो" की नीति ने स्वदेशी आंदोलन को जन्म दिया। 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में औपचारिक रूप से स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ। इसका उद्देश्य विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करके घरेलू उत्पादन पर निर्भर रहना था।

स्वदेशी आंदोलन का विस्तार:

महात्मा गांधी ने इसे "स्वराज" (आत्म-शासन) की आत्मा बताया। आंदोलन ने धीरे-धीरे व्यापक रूप धारण किया जब धनी भारतीयों ने खादी और ग्रामोद्योग समितियों को धन और भूमि दान की, जिससे हर घर में कपड़ा उत्पादन शुरू हो गया। इसमें अन्य ग्रामीण उद्योगों को भी शामिल किया गया ताकि गांवों को आत्मनिर्भर और आत्मनिर्भर बनाया जा सके।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन:

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस आंदोलन को अपने स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। अंततः 15 अगस्त 1947 को, नई दिल्ली के इंडिया गेट के पास प्रिंसेस पार्क में जवाहरलाल नेहरू ने हाथ से बुने हुए खादी के तिरंगे झंडे पर अशोक चक्र को फहराया।

बंगाल का पुनर्मिलन और स्वदेशी आंदोलन का नया अर्थ:

1911 में ब्रिटिश सरकार ने बंगाल का पुनर्मिलन किया और अपनी राजधानी को नई दिल्ली स्थानांतरित कर दिया। बंगाल के पुनर्मिलन के बाद स्वदेशी आंदोलन ने एक नया अर्थ प्राप्त किया। स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय लोगों को एकजुट किया और उन्हें अपने देश के प्रति गर्व और प्रेम की भावना से भर दिया। इसने आर्थिक स्वतंत्रता के लिए लड़ने के साथ ही सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन लाने की भी कोशिश की।


The Swadeshi movement was a self-sufficiency movement that was part of the Indian independence movement and contributed to the development of Indian nationalism. Before the BML Government's decision for the partition of Bengal was made public in December 1903, there was a lot of growing discontentment among the Indians. In response the Swadeshi movement was formally started from Town Hall at Calcutta on 7 August 1905 to curb foreign goods by relying on domestic production. Mahatma Gandhi described it as the soul of swaraj (self-rule). The movement took its vast size and shape after rich Indians donated money and land dedicated to Khadi and Gramodyog societies which started cloth production in every household. It also included other village industries so as to make village self-sufficient and self-reliant. The Indian National Congress used this movement as arsenal for its freedom struggle and ultimately on 15 August 1947, a hand-spun Khadi tricolor Ashoka Chakra Indian flag was unfurled at Princess Park near India Gate, New Delhi by Jawaharlal Nehru.