वट पूर्णिमा
Observance by Hindu married women
वट पूर्णिमा: पति के लम्बे जीवन की कामना का व्रत
वट पूर्णिमा, जिसे वट सावित्री व्रत भी कहा जाता है, एक हिंदू त्योहार है जो नेपाल, उत्तर भारत और पश्चिमी भारतीय राज्यों महाराष्ट्र, गोवा और गुजरात में विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। यह त्यौहार हिन्दू कैलेंडर के अनुसार ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है जो ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार मई-जून में आता है।
इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति के प्रति प्रेम और उनके लम्बे जीवन की कामना के लिए वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा करती हैं और उसके चारों ओर एक पवित्र धागा बांधती हैं। यह उत्सव महाभारत में वर्णित सावित्री और सत्यवान की कथा पर आधारित है।
आइए इसे और विस्तार से समझते हैं:
त्यौहार का महत्व:
यह त्यौहार पति-पत्नी के बीच अटूट प्रेम और बंधन का प्रतीक है। सावित्री ने अपनी पतिव्रता और दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लिए थे।
व्रत और पूजा विधि:
- महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं और वट वृक्ष की पूजा करती हैं।
- वट वृक्ष को जल, दूध, अक्षत, फूल आदि अर्पित किये जाते हैं।
- सावित्री और सत्यवान की कथा का पाठ और श्रवण किया जाता है।
- वट वृक्ष के चारों ओर परिक्रमा की जाती है और कच्चे सूत का धागा बांधा जाता है।
- पति के लम्बे और स्वस्थ जीवन की कामना की जाती है।
वट वृक्ष का महत्व:
हिंदू धर्म में वट वृक्ष को बहुत ही पवित्र माना जाता है। यह वृक्ष त्रिमूर्ति का प्रतीक माना जाता है - जड़ें ब्रह्मा, तना विष्णु और शाखाएं शिव का प्रतिनिधित्व करती हैं। वट वृक्ष दीर्घायु और अमरता का भी प्रतीक है।