Indian Ambulance Corps

भारतीय एम्बुलेंस कोर

Indian Ambulance Corps

नेटाल इंडियन एम्बुलेंस कोर: गांधीजी का मानवतावादी योगदान

दूसरे बोअर युद्ध (1899-1902) के दौरान, महात्मा गांधी ने "नेटाल इंडियन एम्बुलेंस कोर" का गठन किया था। यह कोर घायल सैनिकों को युद्ध क्षेत्र से अस्पताल पहुँचाने का काम करता था।

मुख्य बिंदु:

  • उद्देश्य: इस कोर का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सेना की सहायता करना और युद्ध में घायल हुए सैनिकों की जान बचाना था।
  • रचना: इस कोर में 300 स्वतंत्र भारतीय और 800 अनुबंधित मजदूर शामिल थे।
  • वित्तपोषण: इस कोर का सारा खर्चा स्थानीय भारतीय समुदाय द्वारा उठाया गया था।
  • स्पियन कॉप की लड़ाई: गांधीजी और उनके कोर ने स्पियन कॉप की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जहाँ उन्होंने निस्वार्थ भाव से घायल सैनिकों की सेवा की।
  • मानवता का ध्येय: गांधीजी का मानना था कि यह कोर सभी के लिए है, चाहे वह अफ्रीकी हो या भारतीय।
  • सम्मान: बोअर युद्ध में उनकी सेवाओं के लिए, ब्रिटिश सरकार ने गांधीजी को "कैसर-ए-हिंद" और अन्य पदकों से सम्मानित किया था।
  • त्याग: 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद, गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दिए गए सभी पदक और उपाधियाँ त्याग दीं।

विस्तृत विवरण:

गांधीजी का मानना था कि भारतीयों को ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति अपनी वफादारी दिखानी चाहिए, और इसीलिए उन्होंने इस कोर का गठन किया। यह कोर न केवल ब्रिटिश सैनिकों की मदद कर रहा था, बल्कि इससे गांधीजी को युद्ध की क्रूरता और मानव जीवन के महत्व को समझने का अवसर भी मिला।

नेटाल इंडियन एम्बुलेंस कोर का गठन गांधीजी के मानवीय मूल्यों और निडरता का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में भी, उन्होंने दूसरों की सेवा के लिए खुद को समर्पित कर दिया।


The Natal Indian Ambulance Corps was created by Mahatma Gandhi for use by the British as stretcher bearers during the Second Boer War, with expenses met by the local Indian community. Gandhi and the corps served at the Battle of Spion Kop. It consisted of 300 free Indians and 800 indentured labourers. It was committed to saving the lives of Africans and Indians. Gandhi was bestowed with the 'Kaiser-i-Hind' and other medals by the British for his work in Boer war. This was given up by Gandhi after the Jallianwala Bagh massacre in 1919.