वर्तमान भारत
"बर्तमान भारत" - एक नजर स्वामी विवेकानंद के विचारों पर
"बर्तमान भारत", जिसका अंग्रेजी अनुवाद "मॉडर्न इंडिया" या "प्रेजेंट डे इंडिया" है, स्वामी विवेकानंद द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण बांग्ला निबंध है। यह निबंध पहली बार मार्च १८९९ में 'उद्बोधन' पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। 'उद्बोधन', रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की एकमात्र बांग्ला पत्रिका थी।
१९०५ में इस निबंध को पुस्तक का रूप दिया गया और बाद में इसे 'स्वामी विवेकानंद के संपूर्ण रचनावली' के चौथे खंड में संकलित किया गया।
इस निबंध में, स्वामी विवेकानंद ने पूरे भारतीय इतिहास का संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत किया है। वे भारत के भविष्य के बारे में एक भविष्यवाणी करते हैं - एक ऐसे युग की जहाँ जन-जागरण होगा और समाज का नेतृत्व 'शूद्र' वर्ग करेगा।
यह निबंध भारत के पीड़ित और गरीब लोगों के प्रति स्वामी जी की गहरी चिंता को दर्शाता है। उन्होंने भारतीयों से आह्वान किया कि वे जाति-पाति को भूलकर एक-दूसरे को भाई-भाई मानें।
आइए इस निबंध के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डालें:
- इतिहास का विश्लेषण: स्वामी जी ने प्राचीन भारत की गौरव गाथा का वर्णन करते हुए मुगल और अंग्रेजी शासन के दौरान हुए सामाजिक और आर्थिक शोषण को उजागर किया है।
- शूद्रों का उत्थान: स्वामी जी का मानना था कि आने वाले समय में समाज का नेतृत्व शोषित और वंचित वर्ग करेगा। यह वर्ग अपनी कर्मठता और समर्पण से राष्ट्र को उन्नति की राह पर ले जाएगा।
- भाईचारे का सन्देश: स्वामी जी ने जातिगत भेदभाव को समाज के लिए घातक बताया है। उन्होंने सभी धर्मों और जातियों के लोगों को एकता और प्रेम का संदेश दिया।
- जन-जागरण का आह्वान: स्वामी जी ने राष्ट्रीय चेतना जागृत करने और सामाजिक बुराइयों को दूर करने का आह्वान किया। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक समानता पर जोर दिया।
"बर्तमान भारत" सिर्फ एक निबंध नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी संत का भारत के लिए एक रोडमैप है। यह हमें याद दिलाता है कि हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण करना है।