सुन्दरर
8th-century Indian poet
सुंदरर: तमिल शैव संत और कवि (हिंदी में विस्तृत विवरण)
सुंदरर, जिन्हें चुंतरार, चुंतरमूर्ति, नम्पी अरूरन या तंपिरान तोलान भी कहा जाता है, आठवीं शताब्दी के एक तमिल शैव सिद्धांत परंपरा के कवि-संत थे। वे तेनवारम तिकड़ी में से एक हैं, और तमिलनाडु के शैव भक्ति (भक्ति) कवियों, नयनारों में सबसे प्रमुख हैं।
तेनवारम और सुंदरर के भजन:
- उनके भजन तिरुमुराई के सातवें खंड का निर्माण करते हैं, जो शैव सिद्धांत का बारह-खंडों वाला संकलन है।
- तमिल भाषा में तिरुमुराई में उनके गीतों को सबसे अधिक संगीतमय माना जाता है।
- उनके भजनों में भगवान शिव के प्रति अटूट प्रेम और समर्पण की भावना झलकती है।
सुंदरर का जीवन:
सुंदरर के जीवन और तेनवारम में उनके भजनों को मोटे तौर पर चार चरणों में बांटा गया है:
शिव से पहली मुलाकात और शैव भक्त बनना: सुंदरर का विवाह तय हो गया था लेकिन भगवान शिव ने एक पागल याचक का रूप धारण करके उस विवाह को रुकवा दिया। इस घटना ने सुंदरर को झकझोर कर रख दिया और वे शिव के अनन्य भक्त बन गए।
पार्वती और संगली से विवाह और तिरुवरूर में निवास: सुंदरर ने मंदिर नर्तकियों पार्वती और संगली से विवाह किया और उनके साथ तिरुवरूर में रहने लगे। उनके जीवन का यह दौर भक्ति और प्रेम से परिपूर्ण था।
अंधापन और दृष्टि की वापसी: जीवन में सुंदरर को अंधेपन का भी सामना करना पड़ा। लेकिन भगवान शिव पर अटूट विश्वास और भक्ति के कारण उन्हें अपनी दृष्टि वापस मिल गई।
सांसारिकता और धन का त्याग: जीवन के अंतिम पड़ाव में सुंदरर ने सांसारिक सुखों और धन को त्याग दिया। उन्होंने अपने भजनों में भौतिक वस्तुओं के प्रति मोह को त्यागने और ईश्वर की भक्ति में लीन रहने का संदेश दिया।
सुंदरर का जीवन शैव भक्ति परंपरा के लिए एक प्रेरणा स्रोत है। उनके भजन आज भी तमिलनाडु के मंदिरों और घरों में गूंजते हैं और लोगों को भक्ति और समर्पण का मार्ग दिखाते हैं।