Raghuttama Tirtha
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रघुत्तमा तीर्थ

Raghuttama Tirtha

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श्री रघुत्तम तीर्थ: एक विद्वान, दार्शनिक और संत

रघुत्तम तीर्थ (१५४८-१५९६) एक भारतीय दार्शनिक, विद्वान, धर्मशास्त्री और संत थे। उन्हें भावाबोध आचार्य के नाम से भी जाना जाता है। वे मध्वाचार्य पीठ-उत्तराडी मठ के चौदहवें पीठाधीश्वर थे, जिस पद पर वे ३९ वर्षों तक रहे (१५५७-१५९५)। द्वैत दर्शन के इतिहास में उन्हें एक महत्वपूर्ण ऋषि माना जाता है। मनामपुनडी में उनकी समाधि प्रति वर्ष हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।

रघुत्तम तीर्थ का जन्म एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था, लेकिन उनका पालन-पोषण रघुवर्य तीर्थ के मार्गदर्शन में मठ में हुआ। उन्होंने दस ग्रंथों की रचना की, जिनमें मध्वाचार्य, जयतीर्थ और व्यासतर्थ के कार्यों पर भावाबोध के रूप में टिप्पणियाँ शामिल हैं, जो द्वैत दर्शन को विस्तार से बताते हैं।

कुछ महत्वपूर्ण बातें:

  • रघुत्तम तीर्थ को द्वैत दर्शन के महान विद्वानों में से एक माना जाता है।
  • उन्होंने मध्वाचार्य, जयतीर्थ और व्यासतर्थ के कार्यों पर कई टिप्पणियाँ लिखीं, जिन्हें "भावाबोध" कहा जाता है।
  • उनके ग्रंथों में द्वैत दर्शन को स्पष्ट रूप से समझाया गया है।
  • उनकी समाधि मनामपुनडी में एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है।
  • उनके जीवन और कार्यों ने द्वैत दर्शन के प्रचार और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यह जानकारी आपको रघुत्तम तीर्थ के बारे में अधिक जानकारी प्रदान करेगी।


Raghuttama Tirtha ; IAST:Śrī Raghūttama Tīrtha), was an Indian philosopher, scholar, theologian and saint. He was also known as Bhavabodhacharya. His oeuvre include commentaries on the works of Madhva and Jayatirtha. He served as the fourteenth pontiff of Madhvacharya Peetha - Uttaradi Math from 1557 to 1595, which he occupied for thirty-nine years. He is considered to be one of the important seers in the history of Dvaita school of thought. His shrine at Manampoondi attracts thousands of visitors every year.