Advait Mat

अद्वैत मत

Advait Mat

Cluster of panths in northern India

Advait Mat

Advait Mat या Paramhans Advait Mat उत्तर भारत में स्थित विभिन्न पंथों (शिष्य समूहों) का एक समूह है। इसकी स्थापना श्री स्वामी अद्वैतानंद जी महाराज (1846-1919) ने की थी, जिन्हें परमहंस दयाल जी महाराज के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज (जिन्हें श्री नांगली निवासी भगवान जी भी कहा जाता है) को अपना आध्यात्मिक उत्तराधिकारी घोषित किया।

स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज ने अपने गुरु की शिक्षाओं के प्रसार के उद्देश्य से 300 से अधिक आश्रमों की स्थापना की। उन्होंने अपने हजारों शिष्यों को संन्यास की दीक्षा दी। उनके कई शिष्यों ने इसी ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए आध्यात्मिक संस्थानों की स्थापना की।

श्री परमहंस दयाल जी द्वारा स्थापित आश्रमों को कृष्ण द्वार कहा जाता था। अद्वैत-स्वरूप आश्रम, परमहंस सत्यार्थी धाम, श्री आनंदपुर सत्संग आश्रम जैसे नामों वाले आश्रम भी उनसे और श्री परमहंस अद्वैत मत से जुड़े हुए हैं।

ऐसा माना जाता है कि वे अपनी परंपरा को 18 वीं शताब्दी के तोटापुरी से जोड़ते हैं, जो रामकृष्ण परमहंस के गुरु भी थे।

अतिरिक्त जानकारी:

  • अद्वैत मत, अद्वैत वेदांत के दर्शन पर आधारित है, जो हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण दर्शन है।
  • यह मत अद्वैतवाद के सिद्धांत पर जोर देता है, जिसका अर्थ है "अद्वितीयता"। यह सिद्धांत बताता है कि केवल एक ही वास्तविकता है, जिसे ब्रह्म कहा जाता है, और यह आत्मा (आत्मान) और ब्रह्म के बीच किसी भी द्वैत को नकारता है।
  • श्री स्वामी अद्वैतानंद जी महाराज और स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज को इस परंपरा में महान संत माना जाता है और उनके अनुयायी उनकी शिक्षाओं का पालन करते हैं।

यह जानकारी आपको Advait Mat के बारे में विस्तृत रूप से समझने में मदद करेगी।


Advait Mat or Paramhans Advait Mat is a cluster of panths in northern India. It was founded by Shri Swami Advaitanand Ji Maharaj (1846–1919) who is also known as Paramhans Dyal Ji Maharaj. He declared Swami Swarupanand Ji Maharaj as his spiritual successor. Swami Swarupanand Ji Maharaj founded more than 300 ashrams with the purpose of disseminating his master's teachings. Swami Swarupanand Ji Maharaj had initiated more than thousand of his disciples into the sanyas. Many of his disciples went on to establish spiritual institutions to spread the same knowledge.