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ज्येष्ठ

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ज्येष्ठ

🌟 राशि: वृश्चिक

🌟 नक्षत्र देवता: इंद्र

🌟 नक्षत्र स्वामी: बुध

गण्डमूल नक्षत्र की श्रेणी में होने की वजह से यह भी अशुभ नक्षत्र ही माना जाता है। आप दृढ़ निश्चयी और मज़बूत व्यक्तित्व के स्वामी है। आप नियम से जीवन व्यतीत करना पसंद करते हैं। आप शारीरिक रूप से गठीले और मज़बूत होते हैं तथा कार्य करने में सैनिकों के समान फुर्तीले होते हैं। आपकी दिनचर्या सैनिकों की तरह अनुशासित और सुव्यवस्थित होती है। खुली मानसिकता वाले ये लोग सीमाओं में बंधकर अपना जीवन नहीं जी पाते। ये लोग तुनक मिजाजी होते है और छोटी-छोटी बातों पर लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं। किसी के बारे में आपके विचार शीघ्र नहीं बदलते और दूसरों को आप हठी प्रतीत होते हैा।

शिक्षा और आय

आप सुरक्षा विभाग से जुड़े काम, सरकारी कर्मचारी, संवाददाता, रेडियो या दूरदर्शन के कलाकार, समाचार वाचक, अभिनेता, कथा वाचक, अग्निशमन कर्मचारी, गुप्तचर, अफ़सरशाह या उच्च पदाधिकारी, जलयान सेवा, वन अधिकारी, सेना से जुड़े कार्य, आपदा प्रबंधन दल से जुड़े कार्य, धावक, दूरसंचार या अंतरिक्ष प्रणाली से जुड़े काम, शल्य चिकित्सक आदि के रूप में सफल हो सकते हैं।

पारिवारिक जीवन

आपका वैवाहिक जीवन सामान्यतः सुखी बीतेगा, लेकिन रोज़गार के चलते आप अपने परिवार से दूर रह सकते हैं। मुमकिन है कि आपके जीवनसाथी का प्रभाव आपके ऊपर अधिक रहे, परन्तु उनका अंकुश आपके लिए फ़ायदेमंद रहेगा। उन्हें कुछ स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ हो सकती है, अतः सावधानी अपेक्षित है। अपने सगे भाई-बहनों से आपका कुछ मनमुटाव मुमकिन है।

प्रथम चरण : इस चरण का स्वामी बृहस्पति हैं। इस नक्षत्र में जन्मा जातक क्रूर होता है ।बृहस्पति लग्नेश मंगल का शत्रु है तथा नक्षत्र स्वामी बुध का भी शत्रु है। अतः बुध या मंगल की दशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा अशुभ फल देगी। बृहस्पति की अपनी दशा शुभ फलदायी होगी। मंगल की दशा अन्तर्दशा शुभ फलों से परिपूर्ण होगी।

द्वितीय चरण : इसका स्वामी शनि है।इसमे मंगल, बुध, गुरु का प्रभाव है। नवमांश मकर। यह जबाब दारिया, ललकारना, स्वार्थता, रक्षा, भौतिकवाद का कारक है। जातक विदीर्ण मुख, स्थिर अंग, चौड़े दांत, चौड़ा सर, जुड़े अंग वाला, छोटा पेट, बड़े नेत्र, यौन दुर्बल या नपुसंक होता है।जातक पूर्णतया प्रयोगिक, स्वार्थी, अनुशासित, छोटी उम्र मे परिपक्व और जबाबदार, लक्ष्य पाने हेतु कर्मठ, स्वरोजगारी, अपना भाग्य स्वयं बनाने वाला होता है।

तृतीय चरण : इस चरण का स्वामी शनि हैं। इस नक्षत्र में जन्मा जातक विद्वान् व्यक्ति होगा। शनि लग्नेश मंगल का शत्रु है परन्तु बुध का मित्र है अतः शनि में बुध का अंतर या बुध में शनि का अंतर शुभ फल देगा। लग्नेश मंगल की दशा अन्तर्दशा शुभ फल देगी।

चतुर्थ चरण : इसका स्वामी गुरु है। इसमे मंगल, बुध, गुरु का प्रभाव है। नवमांश मीन। यह भावना, प्रचुरता या स्वतंत्रता, भौतिकता का द्योतक है। जातक गौर वर्ण, मृग सामान नेत्र, सुन्दर पुष्ट देह वाला, भूरे केश, दृढ़,शांतचित्त, गुरुजनो द्वारा सम्मानित होता है।जातक अत्यंत भावुक,आर्थिक विकासवान, इछाओ की पूर्ति करने वाला होता है। ये प्रेम प्रसंगो और यौन क्रियाओ मे युवावस्था से ही सलग्न हो जाते है। ये मनमौजी अपने प्रेमी या प्रेमिका को येन-केन प्रकारेण प्राप्त करने वाले होते है यदि अविभावक विवाह के लिए मना करते है, तो घर से भाग जाते है।