श्री सत्यनारायण भगवान की पूर्णिमा व्रत कथा Satyanarayan Bhagwan ki Katha
सत्यनारायण व्रत कथा का संदर्भ इस प्रकार है, कि पुराकाल में शौनकादि ऋषि नैमिषारण्य स्थित महर्षि सूत के आश्रम पर पहुंचे, महर्षि सूत से प्रश्न करते हुए ऋषि गण पूछते हैं की लौकिक कष्ट, सांसारिक दुखों व कष्टों से मुक्ति पाने के लिए सरल उपाय क्या है? महर्षि सूत जी शौनकादि ऋषियों को बताते हैं कि यही प्रश्न नारद मुनि जी ने भगवान विष्णु से किया था, और भगवान विष्णु ने नारद मुनि को सांसारिक दुखों से मुक्ति का सरल उपाय बताते हुए कहा, इसका एक ही सरल उपाय है वह है सत्यनारायण व्रत।
भगवान विष्णु ने सत्यनारायण का अर्थ सत्याचरण, सत्याग्रह, सत्य निष्ठा बताया है। इस संसार में सुख और समृद्धि की प्राप्ति सत्याचरण द्वारा की जा सकती है और सत्य ही ईश्वर को पाने का सर्वोत्तम मार्ग है।
सत्यनारायण भगवान की कथा - प्रथम अध्याय
कथा इस प्रकार है कि,
एक बार नारद जी भगवान श्री हरि विष्णु के पास जाकर उनकी स्तुति करने लगे, यह देख श्री हरि विष्णु नारद जी से बोले - "हे भक्त आप किस प्रयोजन से यहां आए हैं तथा आपके मन में क्या है? मुझे बताइए!"
नारद मुनि बोले- प्रभु! मृत्यु लोक में अपने अपने पाप कर्मों द्वारा विभिन्न योनियों में जन्म लेने वाले सभी जीव-जंतु, इंसान सभी किसी ना किसी प्रकार के दुख व शारीरिक-मानसिक पीड़ा से ग्रस्त है। भगवन! इन सभी कष्टों वह दुखों से मुक्ति पाने का कोई सरल उपाय बतलाइए, मैं सुनना चाहता हूँ।
श्री हरि विष्णु भगवान ने कहा- हे वत्स! संसार के भले के लिए आपने बहुत अच्छी बात की है इसलिए मैं आपको इसका उपाय बताऊंगा। इस व्रत को करने से व्यक्ति मोह-माया से मुक्ति पा सकता हैं, इसे सुनिए।
भगवान सत्यनारायण का स्वर्ग और मृत्यु लोक में एक महान पुण्यप्रद व्रत है। आपके स्नेह के कारण मैं इसे कह रहा हूँ, विधि विधान से भगवान सत्यनारायण व्रत करके मनुष्य शीघ्र ही सुख समृद्धि प्राप्त कर मृत्यु के बाद परलोक में मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
भगवान विष्णु की बातें सुनकर नारद मुनि बोले- प्रभु इस व्रत को करने का क्या फल मिलता है? इसका विधान क्या है? तथा इस व्रत को किसने किया यह सब विस्तार पूर्वक बताइए मेरी सुनने की इच्छा है।
श्री हरि विष्णु ने कहा - यह सत्यनारायण व्रत दुख, शारीरिक-मानसिक, शौक आदि का शमन करने वाला है व धन-धान्य की वृद्धि करता है सौभाग्य अखंड करता है और संतान प्राप्ति के लिए किया जाता है। भक्ति और श्रद्धा से बंधु बंधुओं के साथ धर्म में तत्पर होकर सायंकाल के समय भगवान सत्यनारायण की पूजा-आराधना करें। नैवेद्य में उत्तम कोटि के भोज्य पदार्थ सवाया मात्रा में अर्पित करना चाहिए, तथा भोग का प्रसाद बनाने के लिए केलें का फल, घी, दूध, साठी, गेहूं या चावल का आटा और शक्कर या गुड लेकर इन सभी को एकत्रित करके सवाया मात्रा में भगवान को भोग लगाना चाहिए तथा पूजा के बाद सब लोगों में विस्तृत करना चाहिए।
सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने के बाद सामर्थ्य अनुसार ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिए और बंधु बांधव व ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। कलियुग में यह सबसे छोटा सा उपाय है।
श्री मन नारायण-नारायण-नारायण।
भज मन नारायण-नारायण-नारायण।
श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
सत्यनारायण व्रत - दूसरा अध्याय
श्रीसूतजी बोले - हे द्विजों! अब मैं पुनः पूर्वकाल में जिसने इस सत्यनारायण व्रत को किया था, उसे भलीभांति विस्तारपूर्वक कहूंगा। रमणीय काशी नामक नगर में कोई अत्यन्त निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह प्रतिदिन पृथ्वी पर भटकता रहता था। ब्राह्मण प्रिय भगवान ने उस दुखी ब्राह्मण को देखकर वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके उस द्विज से आदरपूर्वक पूछा - हे विप्र! प्रतिदिन अत्यन्त दुखी होकर तुम किसलिए पृथ्वी पर भ्रमण करते रहते हो। हे द्विजश्रेष्ठ! यह सब बतलाओ, मैं सुनना चाहता हूँ।
ब्राह्मण बोला - प्रभो! मैं अत्यन्त दरिद्र ब्राह्मण हूँ और भिक्षा के लिए ही पृथ्वी पर घूमा करता हूँ। यदि मेरी इस दरिद्रता को दूर करने का आप कोई उपाय जानते हों तो कृपापूर्वक बतलाइये।
वृद्ध ब्राह्मण बोला - हे ब्राह्मणदेव! सत्यनारायण भगवान् विष्णु अभीष्ट फल को देने वाले हैं। हे विप्र! तुम उनका उत्तम व्रत करो, जिसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।
व्रत के विधान को भी ब्राह्मण से यत्नपूर्वक कहकर वृद्ध ब्राह्मणरूपधारी भगवान् विष्णु वहीं पर अन्तर्धान हो गये। 'वृद्ध ब्राह्मण ने जैसा कहा है, उस व्रत को अच्छी प्रकार से वैसे ही करूंगा' - यह सोचते हुए उस ब्राह्मण को रात में नींद नहीं आयी।
अगले दिन प्रातःकाल उठकर 'सत्यनारायण का व्रत करूंगा' ऐसा संकल्प करके वह ब्राह्मण भिक्षा के लिए चल पड़ा। उस दिन ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत सा धन प्राप्त हुआ। उसी धन से उसने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान सत्यनारायण का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी दुखों से मुक्त होकर समस्त सम्पत्तियों से सम्पन्न हो गया। उस दिन से लेकर प्रत्येक महीने उसने यह व्रत किया। इस प्रकार भगवान् सत्यनारायण के इस व्रत को करके वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी पापों से मुक्त हो गया और उसने दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त किया।
हे विप्र! पृथ्वी पर जब भी कोई मनुष्य श्री सत्यनारायण का व्रत करेगा, उसी समय उसके समस्त दुख नष्ट हो जायेंगे। हे ब्राह्मणों! इस प्रकार भगवान नारायण ने महात्मा नारदजी से जो कुछ कहा, मैंने वह सब आप लोगों से कह दिया, आगे अब और क्या कहूं?
हे मुने! इस पृथ्वी पर उस ब्राह्मण से सुने हुए इस व्रत को किसने किया? हम वह सब सुनना चाहते हैं, उस व्रत पर हमारी श्रद्धा हो रही है।
श्री सूत जी बोले - मुनियों! पृथ्वी पर जिसने यह व्रत किया, उसे आप लोग सुनें। एक बार वह द्विजश्रेष्ठ अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार बन्धु-बान्धवों तथा परिवारजनों के साथ व्रत करने के लिए उद्यत हुआ। इसी बीच एक लकड़हारा वहां आया और लकड़ी बाहर रखकर उस ब्राह्मण के घर गया। प्यास से व्याकुल वह उस ब्राह्मण को व्रत करता हुआ देख प्रणाम करके उससे बोला - प्रभो! आप यह क्या कर रहे हैं, इसके करने से किस फल की प्राप्ति होती है, विस्तारपूर्वक मुझसे कहिये।
विप्र ने कहा - यह सत्यनारायण का व्रत है, जो सभी मनोरथों को प्रदान करने वाला है। उसी के प्रभाव से मुझे यह सब महान धन-धान्य आदि प्राप्त हुआ है। जल पीकर तथा प्रसाद ग्रहण करके वह नगर चला गया। सत्यनारायण देव के लिए मन से ऐसा सोचने लगा कि 'आज लकड़ी बेचने से जो धन प्राप्त होगा, उसी धन से भगवान सत्यनारायण का श्रेष्ठ व्रत करूंगा।' इस प्रकार मन से चिन्तन करता हुआ लकड़ी को मस्तक पर रख कर उस सुन्दर नगर में गया, जहां धन-सम्पन्न लोग रहते थे। उस दिन उसने लकड़ी का दुगुना मूल्य प्राप्त किया।
इसके बाद प्रसन्न हृदय होकर वह पके हुए केले का फल, शक्कर, घी, दूध और गेहूं का चूर्ण सवाया मात्रा में लेकर अपने घर आया। तत्पश्चात उसने अपने बान्धवों को बुलाकर विधि-विधान से भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से वह धन-पुत्र से सम्पन्न हो गया और इस लोक में अनेक सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर अर्थात् बैकुण्ठलोक चला गया।
श्री मन नारायण-नारायण-नारायण।
भज मन नारायण-नारायण-नारायण।
श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
सत्यनारायण व्रत तीसरा अध्याय
श्री सूतजी बोले - श्रेष्ठ मुनियों! अब मैं पुनः आगे की कथा कहूंगा, आप लोग सुनें। प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक राजा था। वह जितेन्द्रिय, सत्यवादी तथा अत्यन्त बुद्धिमान था। वह विद्वान राजा प्रतिदिन देवालय जाता और ब्राह्मणों को धन देकर सन्तुष्ट करता था। कमल के समान मुख वाली उसकी धर्मपत्नी शीला, विनय एवं सौन्दर्य आदि गुणों से सम्पन्न तथा पतिपरायणा थी। राजा एक दिन अपनी धर्मपत्नी के साथ भद्रशीला नदी के तट पर श्रीसत्यनारायण का व्रत कर रहा था। उसी समय व्यापार के लिए अनेक प्रकार की पुष्कल धनराशि से सम्पन्न एक साधु नाम का बनिया वहां आया। भद्रशीला नदी के तट पर नाव को स्थापित कर वह राजा के समीप गया और राजा को उस व्रत में दीक्षित देखकर विनयपूर्वक पूछने लगा।
साधु ने कहा - राजन्! आप भक्तियुक्त चित्त से यह क्या कर रहे हैं? कृपया वह सब बताइये, इस समय मैं सुनना चाहता हूँ।
राजा बोले - हे साधो! पुत्र आदि की प्राप्ति की कामना से अपने बन्धु-बान्धवों के साथ मैं अतुल तेज सम्पन्न भगवान् विष्णु का व्रत एवं पूजन कर रहा हूँ।
राजा की बात सुनकर साधु ने आदरपूर्वक कहा - राजन् ! इस विषय में आप मुझे सब कुछ विस्तार से बतलाइये, आपके कथनानुसार मैं व्रत एवं पूजन करूंगा। मुझे भी संतान नहीं है। 'इससे अवश्य ही संतान प्राप्त होगी।' ऐसा विचार कर वह व्यापार से निवृत्त हो आनन्दपूर्वक अपने घर आया। उसने अपनी भार्या से संतति प्रदान करने वाले इस सत्यव्रत को विस्तार पूर्वक बताया तथा - 'जब मुझे संतान प्राप्त होगी तब मैं इस व्रत को करूंगा' - इस प्रकार उस साधु ने अपनी भार्या लीलावती से कहा।
एक दिन उसकी लीलावती नाम की सती-साध्वी भार्या पति के साथ आनन्द चित्त से ऋतुकालीन धर्माचरण में प्रवृत्त हुई और भगवान् श्रीसत्यनारायण की कृपा से उसकी वह भार्या गर्भिणी हुई। दसवें महीने में उससे कन्यारत्न की उत्पत्ति हुई और वह शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की भांति दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। उस कन्या का 'कलावती' नाम रखा गया। इसके बाद एक दिन लीलावती ने अपने स्वामी से मधुर वाणी में कहा - आप पूर्व में संकल्पित श्री सत्यनारायण के व्रत को क्यों नहीं कर रहे हैं?
साधु बोला - प्रिये! इसके विवाह के समय व्रत करूंगा। इस प्रकार अपनी पत्नी को भली भांति आश्वस्त कर वह व्यापार करने के लिए नगर की ओर चला गया। इधर कन्या कलावती पिता के घर में बढ़ने लगी। तदनन्तर धर्मज्ञ साधु ने नगर में सखियों के साथ क्रीड़ा करती हुई अपनी कन्या को विवाह योग्य देखकर आपस में मन्त्रणा करके कन्या विवाह के लिए श्रेष्ठ वर का अन्वेषण करो - ऐसा दूत से कहकर शीघ्र ही उसे भेज दिया। उसकी आज्ञा प्राप्त करके दूत कांचन नामक नगर में गया और वहां से एक वणिक का पुत्र लेकर आया। उस साधु ने उस वणिक के पुत्र को सुन्दर और गुणों से सम्पन्न देखकर अपनी जाति के लोगों तथा बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्टचित्त हो विधि-विधान से वणिकपुत्र के हाथ में कन्या का दान कर दिया।
उस समय वह साधु बनिया दुर्भाग्यवश भगवान् का वह उत्तम व्रत भूल गया। पूर्व संकल्प के अनुसार विवाह के समय में व्रत न करने के कारण भगवान उस पर रुष्ट हो गये। कुछ समय के पश्चात अपने व्यापारकर्म में कुशल वह साधु बनिया काल की प्रेरणा से अपने दामाद के साथ व्यापार करने के लिए समुद्र के समीप स्थित रत्नसारपुर नामक सुन्दर नगर में गया और अपने श्रीसम्पन्न दामाद के साथ वहां व्यापार करने लगा। उसके बाद वे दोनो राजा चन्द्रकेतु के रमणीय नगर में गये। उसी समय भगवान् श्रीसत्यनारायण ने उसे भ्रष्टप्रतिज्ञ देखकर 'इसे दारुण, कठिन और महान् दुख प्राप्त होगा' - यह श्राप दे दिया।
एक दिन एक चोर राजा चन्द्रकेतु के धन को चुराकर वहीं आया, जहां दोनों वणिक स्थित थे। वह अपने पीछे दौड़ते हुए दूतों को देखकर भयभीतचित्त से धन वहीं छोड़कर शीघ्र ही छिप गया। इसके बाद राजा के दूत वहां आ गये जहां वह साधु वणिक था। वहां राजा के धन को देखकर वे दूत उन दोनों वणिकपुत्रों को बांधकर ले आये और हर्षपूर्वक दौड़ते हुए राजा से बोले - 'प्रभो! हम दो चोर पकड़ लाए हैं, इन्हें देखकर आप आज्ञा दें'। राजा की आज्ञा से दोनों शीघ्र ही दृढ़तापूर्वक बांधकर बिना विचार किये महान कारागार में डाल दिये गये। भगवान् सत्यदेव की माया से किसी ने उन दोनों की बात नहीं सुनी और राजा चन्द्रकेतु ने उन दोनों का धन भी ले लिया।
भगवान के श्राप से वणिक के घर में उसकी भार्या भी अत्यन्त दुखित हो गयी और उनके घर में सारा-का-सारा जो धन था, वह चोर ने चुरा लिया। लीलावती शारीरिक तथा मानसिक पीड़ाओं से युक्त, भूख और प्यास से दुखी हो अन्न की चिन्ता से दर-दर भटकने लगी। कलावती कन्या भी भोजन के लिए इधर-उधर प्रतिदिन घूमने लगी। एक दिन भूख से पीडि़त कलावती एक ब्राह्मण के घर गयी। वहां जाकर उसने श्रीसत्यनारायण के व्रत-पूजन को देखा। वहां बैठकर उसने कथा सुनी और वरदान मांगा। उसके बाद प्रसाद ग्रहण करके वह कुछ रात होने पर घर गयी।
माता ने कलावती कन्या से प्रेमपूर्वक पूछा - पुत्री ! रात में तू कहां रुक गयी थी? तुम्हारे मन में क्या है? कलावती कन्या ने तुरन्त माता से कहा - मां! मैंने एक ब्राह्मण के घर में मनोरथ प्रदान करने वाला व्रत देखा है। कन्या की उस बात को सुनकर वह वणिक की भार्या व्रत करने को उद्यत हुई और प्रसन्न मन से उस साध्वी ने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान् श्रीसत्यनारायण का व्रत किया तथा इस प्रकार प्रार्थना की - 'भगवन! आप हमारे पति एवं जामाता के अपराध को क्षमा करें। वे दोनों अपने घर शीघ्र आ जायं।' इस व्रत से भगवान सत्यनारायण पुनः संतुष्ट हो गये तथा उन्होंने नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को स्वप्न दिखाया और स्वप्न में कहा - 'नृपश्रेष्ठ! प्रातः काल दोनों वणिकों को छोड़ दो और वह सारा धन भी दे दो, जो तुमने उनसे इस समय ले लिया है, अन्यथा राज्य, धन एवं पुत्रसहित तुम्हारा सर्वनाश कर दूंगा।'
राजा से स्वप्न में ऐसा कहकर भगवान सत्यनारायण अन्तर्धान हो गये। इसके बाद प्रातः काल राजा ने अपने सभासदों के साथ सभा में बैठकर अपना स्वप्न लोगों को बताया और कहा - 'दोनों बंदी वणिकपुत्रों को शीघ्र ही मुक्त कर दो।' राजा की ऐसी बात सुनकर वे राजपुरुष दोनों महाजनों को बन्धनमुक्त करके राजा के सामने लाकर विनयपूर्वक बोले - 'महाराज! बेड़ी-बन्धन से मुक्त करके दोनों वणिक पुत्र लाये गये हैं। इसके बाद दोनों महाराज नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को प्रणाम करके अपने पूर्व-वृतान्त का स्मरण करते हुए भयविह्वन हो गये और कुछ बोल न सके।
राजा ने वणिक पुत्रों को देखकर आदरपूर्वक कहा -'आप लोगों को प्रारब्धवश यह महान दुख प्राप्त हुआ है, इस समय अब कोई भय नहीं है।', राजा ने वस्त्र, अलंकार देकर उन दोनों वणिकपुत्रों को संतुष्ट किया तथा सामने बुलाकर वाणी द्वारा अत्यधिक आनन्दित किया। पहले जो धन लिया था, उसे दोगुना करके दिया, उसके बाद राजा ने पुनः उनसे कहा - 'साधो! अब आप अपने घर को जायं।' राजा को प्रणाम करके 'आप की कृपा से हम जा रहे हैं।' - ऐसा कहकर उन दोनों महावैश्यों ने अपने घर की ओर प्रस्थान किया।
श्री मन नारायण-नारायण-नारायण।
भज मन नारायण-नारायण-नारायण।
श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
सत्यनारायण व्रत चौथा अध्याय
श्रीसूत जी बोले - साधु बनिया मंगलाचरण कर और ब्राह्मणों को धन देकर अपने नगर के लिए चल पड़ा। साधु के कुछ दूर जाने पर भगवान सत्यनारायण की उसकी सत्यता की परीक्षा के विषय में जिज्ञासा हुई - 'साधो! तुम्हारी नाव में क्या भरा है?' तब धन के मद में चूर दोनों महाजनों ने अवहेलनापूर्वक हंसते हुए कहा - 'दण्डी संन्यासी! क्यों पूछ रहे हो? क्या कुछ मुद्रा लेने की इच्छा है? हमारी नाव में तो लता और पत्ते आदि भरे हैं।' ऐसी निष्ठुर वाणी सुनकर बोले - 'तुम्हारी बात सच हो जाय' - ऐसा कहकर दण्डी संन्यासी को रूप धारण किये हुए भगवान कुछ दूर जाकर समुद्र के समीप बैठ गये।
दण्डी के चले जाने पर नित्यक्रिया करने के पश्चात उतराई हुई अर्थात जल में उपर की ओर उठी हुई नौका को देखकर साधु अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गया और नाव में लता और पत्ते आदि देखकर मुर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ा। सचेत होने पर वणिकपुत्र चिन्तित हो गया। तब उसके दामाद ने इस प्रकार कहा - 'आप शोक क्यों करते हैं? दण्डी ने श्राप दे दिया है, इस स्थिति में वे ही चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं। अतः उन्हीं की शरण में हम चलें, वहीं मन की इच्छा पूर्ण होगी।' दामाद की बात सुनकर वह साधु बनिया उनके पास गया और वहां दण्डी को देखकर उसने भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया तथा आदरपूर्वक कहने लगा - आपके सम्मुख मैंने जो कुछ कहा है, असत्यभाषण रूप अपराध किया है, आप मेरे उस अपराध को क्षमा करें - ऐसा कहकर बारम्बार प्रणाम करके वह महान शोक से व्याकुल हो गया।
दण्डी ने उसे रोता हुआ देखकर कहा - 'हे मूर्ख! रोओ मत, मेरी बात सुनो। मेरी पूजा से उदासीन होने के कारण तथा मेरी आज्ञा से ही तुमने बारम्बार दुख प्राप्त किया है।' भगवान की ऐसी वाणी सुनकर वह उनकी स्तुति करने लगा।
साधु ने कहा - 'हे प्रभो! यह आश्चर्य की बात है कि आपकी माया से मोहित होने के कारण ब्रह्मा आदि देवता भी आपके गुणों और रूपों को यथावत रूप से नहीं जान पाते, फिर मैं मूर्ख आपकी माया से मोहित होने के कारण कैसे जान सकता हूँ! आप प्रसन्न हों। मैं अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार आपकी पूजा करूंगा। मैं आपकी शरण में आया हूँ। मेरा जो नौका में स्थित पुराा धन था, उसकी तथा मेरी रक्षा करें।' उस बनिया की भक्तियुक्त वाणी सुनकर भगवान जनार्दन संतुष्ट हो गये।
भगवान हरि उसे अभीष्ट वर प्रदान करके वहीं अन्तर्धान हो गये। उसके बाद वह साधु अपनी नौका में चढ़ा और उसे धन-धान्य से परिपूर्ण देखकर 'भगवान सत्यदेव की कृपा से हमारा मनोरथ सफल हो गया' - ऐसा कहकर स्वजनों के साथ उसने भगवान की विधिवत पूजा की। भगवान श्री सत्यनारायण की कृपा से वह आनन्द से परिपूर्ण हो गया और नाव को प्रयत्नपूर्वक संभालकर उसने अपने देश के लिए प्रस्थान किया। साधु बनिया ने अपने दामाद से कहा - 'वह देखो मेरी रत्नपुरी नगरी दिखायी दे रही है'। इसके बाद उसने अपने धन के रक्षक दूत को अपने आगमन का समाचार देने के लिए अपनी नगरी में भेजा।
उसके बाद उस दूत ने नगर में जाकर साधु की भार्या को देख हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा उसके लिए अभीष्ट बात कही -'सेठ जी अपने दामाद तथा बन्धुवर्गों के साथ बहुत सारे धन-धान्य से सम्पन्न होकर नगर के निकट पधार गये हैं।' दूत के मुख से यह बात सुनकर वह अति आनंदित हुई और उस साध्वी ने श्री सत्यनारायण की पूजा करके अपनी पुत्री से कहा -'मैं साधु के दर्शन के लिए जा रही हूँ, तुम शीघ्र आओ।' माता का ऐसा वचन सुनकर व्रत को समाप्त करके प्रसाद का परित्याग कर वह कलावती भी अपने पति का दर्शन करने के लिए चल पड़ी। इससे भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गये और उन्होंने उसके पति को तथा नौका को धन के साथ हरण करके जल में डुबो दिया।
इसके बाद कलावती कन्या अपने पति को न देख महान शोक से रुदन करती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। नाव का अदर्शन तथा कन्या को अत्यन्त दुखी देख भयभीत मन से साधु बनिया ने सोचा - यह क्या आश्चर्य हो गया? नाव का संचालन करने वाले भी सभी चिन्तित हो गये। तदनन्तर वह लीलावती भी कन्या को देखकर विह्वल हो गयी और अत्यन्त दुख से विलाप करती हुई अपने पति से इस प्रकार बोली -' अभी-अभी नौका के साथ वह कैसे अलक्षित हो गया, न जाने किस देवता की उपेक्षा से वह नौका हरण कर ली गयी अथवा श्री सत्यनारायण का माहात्म्य कौन जान सकता है!' ऐसा कहकर वह स्वजनों के साथ विलाप करने लगी और कलावती कन्या को गोद में लेकर रोने लगी।
कलावती कन्या भी अपने पति के नष्ट हो जाने पर दुखी हो गयी और पति की पादुका लेकर उनका अनुगमन करने के लिए उसने मन में निश्चय किया। कन्या के इस प्रकार के आचरण को देख भार्या सहित वह धर्मज्ञ साधु बनिया अत्यन्त शोक-संतप्त हो गया और सोचने लगा - या तो भगवान सत्यनारायण ने यह अपहरण किया है अथवा हम सभी भगवान सत्यदेव की माया से मोहित हो गये हैं। अपनी धन शक्ति के अनुसार मैं भगवान श्री सत्यनारायण की पूजा करूंगा। सभी को बुलाकर इस प्रकार कहकर उसने अपने मन की इच्छा प्रकट की और बारम्बार भगवान सत्यदेव को दण्डवत प्रणाम किया। इससे दीनों के परिपालक भगवान सत्यदेव प्रसन्न हो गये। भक्तवत्सल भगवान ने कृपापूर्वक आकाशवाणी की - 'तुम्हारी कन्या प्रसाद छोड़कर अपने पति को देखने चली आयी है, निश्चय ही इसी कारण उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके वह पुनः आये तो हे साधु बनिया तुम्हारी पुत्री पति को प्राप्त करेगी, इसमें संशय नहीं।
कन्या कलावती भी आकाशमण्डल से ऐसी वाणी सुनकर शीघ्र ही घर गयी और उसने प्रसाद ग्रहण किया। पुनः आकर स्वजनों तथा अपने पति को देखा। तब कलावती कन्या ने अपने पिता से कहा - 'अब तो घर चलें, विलम्ब क्यों कर रहे हैं?' कन्या की वह बात सुनकर वणिकपुत्र संतुष्ट हो गया और विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण का पूजन करके धन तथा बन्धु-बान्धवों के साथ अपने घर गया। तदनन्तर पूर्णिमा तथा संक्रान्ति पर्वों पर भगवान सत्यनारायण का पूजन करते हुए इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वह सत्यपुर बैकुण्ठलोक में चला गया।
श्री मन नारायण-नारायण-नारायण।
भज मन नारायण-नारायण-नारायण।
श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
सत्यनारायण व्रत - पांचवा अध्याय
श्रीसूत जी बोले - श्रेष्ठ मुनियों! अब इसके बाद मैं दूसरी कथा कहूंगा, आप लोग सुनें। अपनी प्रजा का पालन करने में तत्पर तुंगध्वज नामक एक राजा था। उसने सत्यदेव के प्रसाद का परित्याग करके दुख प्राप्त किया। एक बार वह वन में बहुत से पशुओं को मारकर वटवृक्ष के नीचे आया। वहां उसने देखा कि गोपगण बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्ट होकर भक्तिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा कर रहे हैं। राजा यह देखकर भी अहंकारवश न तो वहां गया और न उसे भगवान सत्यनारायण को प्रणाम ही किया। पूजन के बाद सभी गोपगण भगवान का प्रसाद राजा के समीप रखकर वहां से लौट आये और इच्छानुसार उन सभी ने भगवान का प्रसाद ग्रहण किया। इधर राजा को प्रसाद का परित्याग करने से बहुत दुख हुआ।
उसका सम्पूर्ण धन-धान्य एवं सभी सौ पुत्र नष्ट हो गये। राजा ने मन में यह निश्चय किया कि अवश्य ही भगवान सत्यनारायण ने हमारा नाश कर दिया है। इसलिए मुझे वहां जाना चाहिए जहां श्री सत्यनारायण का पूजन हो रहा था। ऐसा मन में निश्चय करके वह राजा गोपगणों के समीप गया और उसने गोपगणों के साथ भक्ति-श्रद्धा से युक्त होकर विधिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा की। भगवान सत्यदेव की कृपा से वह पुनः धन और पुत्रों से सम्पन्न हो गया तथा इस लोक में सभी सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुआ।
श्रीसूत जी कहते हैं - जो व्यक्ति इस परम दुर्लभ श्री सत्यनारायण के व्रत को करता है और पुण्यमयी तथा फलप्रदायिनी भगवान की कथा को भक्तियुक्त होकर सुनता है, उसे भगवान सत्यनारायण की कृपा से धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है। दरिद्र धनवान हो जाता है, बन्धन में पड़ा हुआ बन्धन से मुक्त हो जाता है, डरा हुआ व्यक्ति भय मुक्त हो जाता है - यह सत्य बात है, इसमें संशय नहीं। इस लोक में वह सभी ईप्सित फलों का भोग प्राप्त करके अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को जाता है। हे ब्राह्मणों! इस प्रकार मैंने आप लोगों से भगवान सत्यनारायण के व्रत को कहा, जिसे करके मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।
कलियुग में तो भगवान सत्यदेव की पूजा विशेष फल प्रदान करने वाली है। भगवान विष्णु को ही कुछ लोग काल, कुछ लोग सत्य, कोई ईश और कोई सत्यदेव तथा दूसरे लोग सत्यनारायण नाम से कहेंगे। अनेक रूप धारण करके भगवान सत्यनारायण सभी का मनोरथ सिद्ध करते हैं। कलियुग में सनातन भगवान विष्णु ही सत्यव्रत रूप धारण करके सभी का मनोरथ पूर्ण करने वाले होंगे। हे श्रेष्ठ मुनियों! जो व्यक्ति नित्य भगवान सत्यनारायण की इस व्रत-कथा को पढ़ता है, सुनता है, भगवान सत्यारायण की कृपा से उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। हे मुनीश्वरों! पूर्वकाल में जिन लोगों ने भगवान सत्यनारायण का व्रत किया था, उसके अगले जन्म का वृतान्त कहता हूँ, आप लोग सुनें।
महान प्रज्ञासम्पन्न शतानन्द नाम के ब्राह्मण सत्यनारायण व्रत करने के प्रभाव से दूसरे जन्म में सुदामा नामक ब्राह्मण हुए और उस जन्म में भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। लकड़हारा भिल गुहों का राजा हुआ और अगले जन्म में उसने भगवान श्रीराम की सेवा करके मोक्ष प्राप्त किया। महाराज उल्कामुख दूसरे जन्म में राजा दशरथ हुए, जिन्होंने श्रीरंगनाथजी की पूजा करके अन्त में वैकुण्ठ प्राप्त किया। इसी प्रकार धार्मिक और सत्यव्रती साधु पिछले जन्म के सत्यव्रत के प्रभाव से दूसरे जन्म में मोरध्वज नामक राजा हुआ। उसने आरे से चीरकर अपने पुत्र की आधी देह भगवान विष्णु को अर्पित कर मोक्ष प्राप्त किया। महाराजा तुंगध्वज जन्मान्तर में स्वायम्भुव मनु हुए और भगवत्सम्बन्धी सम्पूर्ण कार्यों का अनुष्ठान करके वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुए। जो गोपगण थे, वे सब जन्मान्तर में व्रजमण्डल में निवास करने वाले गोप हुए और सभी राक्षसों का संहार करके उन्होंने भी भगवान का शाश्वत धाम गोलोक प्राप्त किया।
श्री मन नारायण-नारायण-नारायण।
भज मन नारायण-नारायण-नारायण।
श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अन्तर्गत रेवाखण्ड में श्रीसत्यनारायण व्रत कथा का यह पांचवां अध्याय पूर्ण हुआ।
Shri Satyanarayan Vrat Katha in English
The whole context of the Satyanarayan Bhagwan Story is that in ancient times, Shaunkadi Rishi reached the ashram of Maharishi Soot located at Naimisharanya. The sages ask Maharishi Sut what is the simple remedy for liberation from worldly suffering, worldly happiness, prosperity, and achievement of the supernatural goal. Maharishi Soot tells the sages that Narad ji had asked a similar question to Lord Vishnu. Lord Vishnu told Narad ji that there is only one highway for liberation from worldly afflictions, worldly happiness, prosperity, and attainment of supernatural goals, and that is Satyanarayan Vrat. Satyanarayana means truthfulness, satyagraha, and integrity. The attainment of happiness and prosperity in the world is possible only through truthful conduct. Truth is God. Satyacharan means worship of God, worship of God.
SATYANARAYAN VRAT CHAPTER 1
The story begins with Sut ji narrating the story. Narad ji goes to Lord Vishnu and praises him. After hearing the praise, Lord Shri Vishnu ji said to Narad ji - Great! For what purpose have you come here, what is on your mind? Say, I'll tell you everything. Narad ji said - Lord! In the world of death, all the people born in different species by their sinful deeds are suffering from many kinds of troubles.
Oh Nath! By which small measure their sufferings can be redressed, if you have mercy on me, then I want to hear all that. (Tell him)
Shri Bhagwan said - O Vatsa! You have asked a very good point about the desire to be gracious to the world. Let me tell you the fast by which the creature becomes free from attachment, listen. O son! There is a great virtuous fast of Lord Satyanarayan, rare in heaven and in the world of death. Because of your affection, I am telling him at this time. By observing Lord Satyanarayan Vrat in a good way, one can attain happiness soon and attain salvation in the hereafter.
Narad Muni said, Lord, what is the fruit of observing this fast? What is its legislation? Who observed this fast and when should it be done? Explain all this in detail.
Shri Bhagwan said - This Satyanarayan fast is the one who quenches sorrows and sorrows, increases wealth and food, gives good fortune and children and gives victory everywhere. Any day, in sync with devotion and reverence, one should worship Lord Satyanarayan in the evening, being ready in religion along with brahmins and brothers and sisters. In the form of naivedya, good quality food items should be offered devotionally in small quantities. Banana fruits, ghee, milk, wheat powder or in the absence of wheat powder, sathi rice powder, sugar, or jaggery – all these edible ingredients should be collected and offered in a small quantities.
Hearing the story of Lord Satyanarayan along with brothers and sisters, Brahmins should be given dakshina. Thereafter, Brahmins should be fed food along with brothers and sisters. Dance-song etc. should be organized by taking prasad with devotion. After that, remembering Lord Satyanarayana one should go to his home. By doing this the desires of human beings are definitely fulfilled. Especially in Kaliyuga, this is the shortest remedy in Prithviloka.
श्री मन नारायण-नारायण-नारायण।
भज मन नारायण-नारायण-नारायण।
श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
SATYANARAYAN VRAT CHAPTER 2
Shri Sutji said - O dvijas! Now I will again describe in detail the one who performed this Satyanarayan fast in the past. There lived a very poor Brahmin in the delightful city of Kashi. Distraught with hunger and thirst, he wandered the earth every day. Seeing that sad Brahmin, God, taking the form of an old Brahmin, respectfully asked that Dwij - O Vipra! Why do you keep traveling on the earth every day being very sad? O best of two! Tell me all this, I want to hear.
The brahmin said - Lord! I am a very poor brahmin and roam the earth only for alms. If you know any way to remove this poverty of mine, then please tell me.
The old brahmin said - O brahmin! Satyanarayan Lord Vishnu is the giver of the desired result. O Vipra! You should do his best fast, by doing which a person becomes free from all sorrows.
Lord Vishnu, who was in the form of an old Brahmin, disappeared thereby diligently telling the law of the fast to the Brahmin. The brahmin could not sleep in the night thinking, 'As told by the old brahmin, I will do that fast properly.
The next day, waking up early in the morning, the brahmin went for alms with a resolution like 'I will fast for Satyanarayan'. On that day the Brahmin received a lot of money in alms. With the same money, he fasted Lord Satyanarayan along with his brothers and sisters. Due to the effect of this fast, that noble Brahmin became free from all sorrows and became full of all wealth. From that day onwards he observed this fast every month. Thus by observing this fast of Lord Satyanarayana, the superior Brahmin was freed from all sins and attained rare salvation.
O Vipra! Whenever a person observes the fast of Shri Satyanarayan on earth, at that time all his miseries will be destroyed. O brahmins! In this way, whatever Lord Narayan said to Mahatma Naradji, I have told you all, what should I say next?
Oh my! Who on this earth performed this fast after hearing from that brahmin? We want to hear all that, we are having faith in that fast.
Shri Sut ji said - Munis! Listen to the one who observed this fast on the earth. Once that Dwijashrestha, according to his wealth, got ready to fast with his brothers and family members. In the meantime a woodcutter came there and went to the Brahmin's house, keeping the wood outside. Distraught with thirst, seeing that Brahmin fasting, he bowed down and said to him - Lord! What are you doing, what is the result of doing it, tell me in detail.
Vipra said - This is the fast of Satyanarayan, the one who grants all desires. Due to his influence, I have received all this great wealth, etc. After drinking water and taking prasad, he went to the city. For Satyanarayan Dev, I started thinking like this with my heart 'I will do the best fast of Lord Satyanarayan with the money that I will get from selling wood today.' In this way, meditating with his mind, keeping the wood on his head, he went to the beautiful city where rich people lived. That day he got twice the price of the wood.
After this, with a happy heart, he came to his house with ripe banana fruit, sugar, ghee, milk, and wheat powder in a quarter quantity. After that, he called his brothers and performed a fast to Lord Shri Satyanarayan by law. Due to the effect of that fast, he became full of wealth and son and after enjoying many pleasures in this world, he finally went to Satyapur i.e. Baikunthalok.
श्री मन नारायण-नारायण-नारायण।
भज मन नारायण-नारायण-नारायण।
श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
SATYANARAYAN VRAT CHAPTER 3
Shri Sutji said - Best sages! Now I will tell the next story again, you guys listen. In ancient times there was a king named Ulkamukh. He was witty, truthful and very intelligent. The learned king used to visit the temple every day and satisfy the Brahmins by giving them money. His wife, Sheela, having a lotus-like face, was endowed with virtues like modesty and beauty and was devoted to her. One day the king along with his wife was fasting on the banks of the Bhadrashila river on the banks of the river, Sri Satyanarayana. At the same time, a bania named Sadhu, who was endowed with many types of Pushkal money for business, came there. After setting up the boat on the bank of river Bhadrashila, he went near the king and, seeing the king initiated into that fast, started asking humbly.
The monk said - Rajan! What are you doing with a devotional mind? Please tell me all that I want to hear at this time.
The king said - O sadho! With the desire to have a son, etc., along with my brothers and sisters, I am fasting and worshiping Lord Vishnu, the incomparable effulgent.
After listening to the king, the monk respectfully said - Rajan! You tell me everything in detail in this matter, and according to your statement, I will fast and worship. I don't have children either. 'By this surely a child will be obtained.' Thinking so, he retired from business and happily came to his home. He explained in detail this Satyavrata, which gave progeny from his wife and - 'When I get a child, then I will do this fast' - thus the sage said to his brother-in-law Leelavati.
One day, her sati-sadhvi named Leelavati, along with her husband, engaged in seasonal religious practices with joy and by the grace of Lord Sri Satyanarayana, she became pregnant. Kanyaratna was born from her in the tenth month and she started growing day by day like the moon of Shukla Paksha. That girl was named 'Kalavati'. After this, one day Lilavati said in a sweet voice to her master - Why are you not observing the fast of Shri Satyanarayan, as determined earlier?
The monk said - dear! I will fast at the time of his marriage. Thus after convincing his wife well, he went to the city to do business. Here the girl Kalavati started growing up in her father's house. After that, the virtuous sage, playing with friends in the city, seeing his daughter worthy of marriage, consulted amongst themselves and searched for the best groom for the girl's marriage - saying this to the messenger and sending him soon. On receiving his permission, the messenger went to a city named Kanchan and brought a merchant's son from there. Seeing that Vanik's son was handsome and endowed with qualities, being satisfied with the people of his caste and brothers and sisters, he donated the girl by law in the hands of Vanikputra.
At that time that sage-baniya, unfortunately, forgot that best vow of God. According to the earlier resolution, the Lord became angry with him for not observing the fast at the time of marriage. After some time, skilled in his business, he went to the beautiful city of Ratnasarpur, located near the sea, to do business with his son-in-law, and started doing business there with his rich son-in-law. After that both of them went to the delightful city of King Chandraketu. At the same time, Lord Sri Satyanarayana, seeing him as corrupt-minded, gave a curse - 'It will be painful, difficult and great misery'.
One day a thief stole the money of King Chandraketu and came to the place where both the merchants were located. Seeing the messengers running after him, he quickly hid, leaving the money there in fear. After this, the messengers of the king came to the place where he was a sage vanik. Seeing the king's wealth there, the messengers brought the two sons of Vanik tied up and running with joy and said to the king - 'Lord! We have caught two thieves, seeing them, you give orders. By the order of the king, both were soon tied firmly and without any thought, they were put in the great prison. Due to the illusion of Lord Satyadev, no one listened to both of them and King Chandraketu took away the wealth of both of them.
Due to the curse of the Lord, his wife in the merchant's house also became very sad and the thief stole all the wealth that was in their house. Lilavati, suffering from physical and mental pains, suffering from hunger and thirst, started wandering from door to door worrying about food. Kalavati girl also started roaming here and there every day for food. One day, suffering from hunger, Kalavati went to a Brahmin's house. Going there, he saw the fast worship of Shri Satyanarayan. Sitting there, he listened to the story and asked for a boon. After that, after taking the prasad, she went home after a few nights.
Mother lovingly asked Kalavati girl - daughter! Where did you stay at night? What's on your mind? Kalavati girl immediately said to her mother - Mother! I have seen a wish-giving fast in the house of a brahmin. On hearing that girl's words, she got ready to fast for the merchant's wife, and with a happy heart, that sadhvi along with her brothers and sisters fasted for Lord Sri Satyanarayana and thus prayed - 'Lord! You forgive the crime of our husband and Jamata. Both of them should come to their homes soon.
' Lord Satyanarayana was again satisfied with this fast and he showed the dream to Nripashreshtha Chandraketu and said in the dream - 'Nrupashreshtha! Leave both the merchants