Adi Shankara
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आदि शंकराचार्य

Adi Shankara

8th-century Indian Vedic scholar and teacher of Advaita Vedanta

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आदि शंकर: एक सरल व्याख्या और विस्तृत विवरण

आदि शंकर, जिन्हें आदि शंकराचार्य भी कहा जाता है, 8वीं शताब्दी के एक महान भारतीय वैदिक विद्वान और अद्वैत वेदांत के शिक्षक (आचार्य) थे।

कौन थे आदि शंकर?

  • नाम: आदि शंकर या आदि शंकराचार्य (आदि का अर्थ है "प्रथम")
  • जन्म: 8वीं शताब्दी ईस्वी (सटीक तिथि अज्ञात)
  • कार्य: दार्शनिक, विद्वान, शिक्षक
  • सिद्धांत: अद्वैत वेदांत
  • योगदान: उन्होंने वेदांत दर्शन की अद्वैत व्याख्या को पुनर्जीवित किया और उसे लोकप्रिय बनाया।

आदि शंकर का जीवन और प्रभाव:

शंकर के जीवन के बारे में विश्वसनीय जानकारी बहुत कम है। हालांकि, उनकी छवि "हिंदू धर्म और संस्कृति के प्रतीक" के रूप में स्थापित है, भले ही अधिकांश हिंदू अद्वैत वेदांत का पालन नहीं करते हैं।

  • बौद्ध धर्म का विरोध: उन्हें "बौद्धों (और जैनों) के आक्रमणों के खिलाफ हिंदू धर्म को पुनर्स्थापित" करने वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने बौद्ध धर्म को भारत से बाहर निकालने में मदद की।
  • पंચायतन पूजा: परंपरा उन्हें विभिन्न संप्रदायों (वैष्णववाद, शैववाद और शाक्तism) को समेटने वाले व्यक्ति के रूप में भी चित्रित करती है। उन्होंने पंचायतन पूजा की शुरुआत की, जिसमें पांच देवताओं - गणेश, सूर्य, विष्णु, शिव और देवी - की एक साथ पूजा की जाती है। उनका तर्क था कि सभी देवता एक ब्रह्म के अलग-अलग रूप हैं, जो अदृश्य सर्वोच्च सत्ता है।

ऐतिहासिक प्रभाव:

10वीं शताब्दी तक, शंकर अपने समकालीन दार्शनिक मंडन मिश्र की छाया में रहे। ११वीं शताब्दी तक समकालीन हिंदू, बौद्ध या जैन स्रोतों में उनका कोई उल्लेख नहीं मिलता है।

  • शंकराचार्य उपाधि: शंकराचार्य की उपाधि, जो भारत में कुछ मठों के प्रमुखों द्वारा उपयोग की जाती है, उनके नाम से ली गई है।
  • देवीकरण: १४वीं-१७वीं शताब्दी की जीवनी उन्हें एक शासक-त्यागी के रूप में चित्रित करती हैं, जो अपने दर्शन का प्रचार करने के लिए पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में दिग्विजय (चारों दिशाओं की विजय) पर यात्रा करते हैं और अपने विरोधियों को धार्मिक बहसों में हराते हैं।
  • मठों की स्थापना: इन जीवनी में उन्हें चार मठों ("मठों") की स्थापना करते हुए दर्शाया गया है।
  • दशनामी परंपरा: आदि शंकर को दशनामी संन्यासी परंपरा के संगठनकर्ता और षण्मता पूजा परंपरा के एकीकरणकर्ता के रूप में भी माना जाता है।

कृतियाँ:

उनकी प्रसिद्धि के कारण, 300 से अधिक ग्रंथ उनके नाम से जुड़े हैं, जिनमें भाष्य (टिप्पणियाँ), प्रकरण ग्रंथ (परिचयात्मक सामयिक व्याख्याएँ) और स्तोत्र (कविता) शामिल हैं। हालांकि, इनमें से अधिकांश की रचना उनके प्रशंसकों, धोखेबाजों या समान नाम वाले विद्वानों द्वारा किए जाने की संभावना है।

  • प्रामाणिक रचनाएँ:
    • ब्रह्मसूत्रभाष्य
    • दस प्रमुख उपनिषदों पर उनकी टीकाएँ
    • भगवद गीता पर उनकी टिप्पणी
    • उपदेशसाहस्री
  • विवादित प्रामाणिकता: विवेकचूड़ामणि के लेखक होने की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए गए हैं और विद्वानों ने इसे खारिज कर दिया है।

शंकर के दर्शन:

उनकी प्रामाणिक रचनाएँ शास्त्रों का सामंजस्यपूर्ण पठन प्रस्तुत करती हैं, जिसके मूल में स्वयं का मुक्तिदायक ज्ञान है, जो उनके समय की अद्वैत वेदांत शिक्षाओं का संश्लेषण करता है।

  • मुख्य विचार: जीवत्मन (व्यक्तिगत आत्मा) की आत्मान-ब्रह्म के रूप में वास्तविक पहचान का मुक्तिदायक ज्ञान।
  • उपनिषदों का महत्व: शंकर ने उपनिषदों को वेदों के कर्मकांड-उन्मुख मीमांसा-व्याख्या से परे, ज्ञान के एक स्वतंत्र साधन के रूप में लिया।
  • बौद्ध धर्म का प्रभाव: शंकर के अद्वैत दर्शन में महायान बौद्ध धर्म का प्रभाव दिखाई देता है, हालांकि शंकर ने बौद्ध धर्म की आलोचना की थी।
  • आलोचना: हिंदू वैष्णव विरोधियों ने शंकर पर "गुप्त बौद्ध" होने का आरोप लगाया है, एक योग्यता जिसे अद्वैत वेदांत परंपरा द्वारा खारिज कर दिया गया है, जो आत्मान, अनात्मन और ब्रह्म पर उनके संबंधित विचारों को उजागर करता है।

निष्कर्ष:

आदि शंकर भारतीय दर्शन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। उनके जीवन और कार्यों ने अद्वैत वेदांत के विकास और हिंदू धर्म के भीतर उसके स्थान को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


Adi Shankara, also called Adi Shankaracharya, was an Indian Vedic scholar and teacher (acharya) of Advaita Vedanta. Reliable information on Shankara's actual life is scanty, and his true impact lies in his "iconic representation of Hindu religion and culture," despite the fact that most Hindus do not adhere to Advaita Vedanta. He is seen as "the one who restored the Hindu dharma against the attacks of the Buddhists and in the process helped to drive Buddhism out of India." Tradition also portrays him as the one who reconciled the various sects with the introduction of the Pañcāyatana form of worship, the simultaneous worship of five deities – Ganesha, Surya, Vishnu, Shiva and Devi, arguing that all deities were but different forms of the one Brahman, the invisible Supreme Being.