



केतु (पौराणिक कथा)
Hindu deity representing descending lunar node
केतु: छाया ग्रह और उसका ज्योतिषीय महत्व (Ketu: Shadow Planet and its Astrological Significance)
"केतु" एक वैदिक ज्योतिषीय अवधारणा है जो चंद्रमा के दक्षिणी नोड (descending node) को दर्शाता है। इसे एक छाया ग्रह माना जाता है क्योंकि इसका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है।
पौराणिक कथा:
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, केतु और राहु असुर स्वर्भानु के दो भाग हैं। स्वर्भानु ने छल से देवताओं से अमृत पान करने का प्रयास किया था, जिसे भगवान विष्णु ने देख लिया। विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से स्वर्भानु का सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन अमृत की कुछ बूंदें स्वर्भानु के गले से नीचे उतर चुकी थीं, जिससे उसका सिर (राहु) और धड़ (केतु) अमर हो गए।
ज्योतिष में केतु:
- केतु और राहु हमेशा एक-दूसरे से 180 डिग्री के कोण पर होते हैं और 18 साल में अपनी कक्षा पूरी करते हैं।
- ज्योतिष में केतु को मंगल के साथ वृश्चिक राशि का स्वामी माना जाता है।
- केतु को मोक्ष, आध्यात्मिकता, रहस्य, अलगाव, और अचानक होने वाली घटनाओं का कारक माना जाता है।
- केतु के शुभ प्रभाव से व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति, गूढ़ विधाओं में रुचि, और जीवन में असाधारण सफलता प्राप्त होती है।
- वहीं, केतु के अशुभ प्रभाव से व्यक्ति को मानसिक तनाव, भ्रम, दुर्घटना, और रोगों का सामना करना पड़ सकता है।
ग्रहण:
खगोलीय दृष्टि से, राहु और केतु उन बिंदुओं को दर्शाते हैं जहाँ सूर्य और चंद्रमा के मार्ग एक-दूसरे को काटते हैं। जब सूर्य और चंद्रमा इन बिंदुओं पर होते हैं, तो ग्रहण लगते हैं। चूँकि केतु चंद्रमा के दक्षिणी नोड पर स्थित होता है, इसलिए इसे चंद्र ग्रहण का कारण माना जाता है।
सारांश:
केतु एक महत्वपूर्ण छाया ग्रह है जिसका मानव जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसकी स्थिति जन्म कुंडली में विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करती है और व्यक्ति के जीवन में आने वाली चुनौतियों और सफलताओं को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

